हिन्दी फ़िल्मों के ब्रांड एंबेसडर और 'रोमांस के किंग' शाहरुख़ ख़ान की कहानी

-रेहान फ़ज़ल भारत के लोगों के बारे में कहा जाता है कि वो फ़िल्मों के लिए पागल हैं. दुनिया में सबसे अधिक करीब 1500 से 2000 के बीच फ़िल्में भारत में बनती हैं. इनमें से करीब 120 से 140 फ़िल्में हिन्दी में होती हैं. कई आकलनों में ऐसा दावा किया जाता है कि देश भर की करीब 30 हज़ार स्क्रीनों पर डेढ़ करोड़ लोग रोज़ फ़िल्में देखते हैं. भारत के लोग चाहे वो देश में रहने वाले हों या फिर विदेश में रह रहे हों, उनमें शाहरुख़ ख़ान की जबरदस्त फ़ैन फ़ॉलोइंग है. उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि मुंबई में लोग उनके बंगले को उस तरह देखने जाते हैं, जैसे वो कोई पर्यटन स्थल हो. कभी-कभी शाहरुख़ ख़ान बंगले के टैरेस पर आकर अपने चाहने वालों को हाथ हिला कर उनका मन जीत लेते हैं. मशहूर फ़िल्म पत्रकार अनुपमा चोपड़ा शाहरुख़ ख़ान की जीवनी किंग ऑफ़ बॉलीवुड शाहरुख़ ख़ान में लिखती हैं, पेशावर में एक मोहल्ला है ढाकी नाल बंदी. वहाँ एक घर है जहाँ एक ज़माने में पृथ्वीराज कपूर रहा करते थे. वहाँ से पाँच मिनट की दूरी पर एक और मोहल्ला है, डूमा गली जहाँ के एक घर में दिलीप कुमार का जन्म हुआ था. वे लिखती हैं, इन दोनों घरों के वॉकिंग डिस्टेंस पर एक और मोहल्ले शाहवाली क़तल की एक पतली गली के मकान नंबर 1147 में सन 1928 में शाहरुख़ ख़ान के पिता मीर ताज मोहम्मद का जन्म हुआ था. जब सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो करीब 60 हज़ार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. गिरफ़्तार किए गए लोगों में मीर और उनके भाई गामा भी थे. ये देखते हुए कि उस इलाके की राजनीतिक अशांति मीर की पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है, उनके परिवार वालों ने सन 1946 में उन्हें दिल्ली भेज दिया. जब सन 1947 में भारत का विभाजन हुआ तो मीर ताज मोहम्मद दिल्ली में थे, लेकिन उनका कहने के लिए कोई अपना देश नहीं था क्योंकि उनकी राजनीतिक गतिविधियों और सरहदी गाँधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के साथ उनकी नज़दीकी के कारण उनके पेशावर जाने पर प्रतिबंध लगा हुआ था. 15 वर्ष की आयु में पिता को खोया आज़ाद भारत में मीर ताज मोहम्मद ने देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद के ख़िलाफ़ 1952 में चुनाव लड़ा, लेकिन उसमें उनकी हार हुई. आज़ादी के 13 साल बाद उनकी मुलाक़ात हैदराबाद की रहने वाली फ़ातिमा से हुई जिनसे उन्होंने काफ़ी मशक्कत के बाद विवाह किया. शाहरुख़ ख़ान का जन्म 2 नवंबर, 1965 को हुआ. दिल्ली के तलवार नर्सिंग होम में उनका जन्म हुआ. वह मीर और फ़ातिमा की दूसरी औलाद थे. उस ज़माने में वे दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में रहा करते थे. मोहर बसु शाहरुख़ की जीवनी लीजेंड, आइकन, स्टार शाहरुख़ ख़ान में लिखती हैं, शाहरुख़ के पिता उन्हें यार कह कर पुकारते थे. शाहरुख़ का बचपन एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के ज़माने में बीता. उस समय वो अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फ़ैन हुआ करते थे. उन दिनों उनकी दोस्त अमृता सिंह उनके साथ अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखने जाया करती थीं. ये दोनों पैसे बचाने के लिए अक्सर हॉल में सबसे आगे बैठा करते थे. बाद में उन्होंने सन 1983 में आई बेताब फ़िल्म से अपने करियर की शुरुआत की थी. शाहरुख़, उनकी बड़ी बहन शहनाज़ और अमृता एक ही स्कूल में पढ़ा करते थे. अमृता ने उन्हें तैराकी सिखाने की भरपूर कोशिश की लेकिन वे उसमें कामयाब नहीं हुईं. जब शाहरुख़ सिर्फ़ 15 वर्ष के थे, उनके पिता का कैंसर की बीमारी से निधन हो गया. स्कूल की शरारतें सन 1972 में शाहरुख़ ख़ान का दाख़िला दिल्ली के मशहूर सेंट कोलंबस स्कूल में कराया गया. स्कूल में साफ़ नाख़ून और छोटे बाल रखने के नियम बहुत सख़्त थे. बड़े बाल वाले लड़कों को स्कूल से सीधे गोल मार्केट के पास बाल कटवाने की दुकान पर भेज दिया जाता था. बड़े बाल रखने वाले शाहरुख़ को अक्सर उस दुकान पर भेजा जाता था. 11वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शाहरुख़ की हिम्मत बढ़ गई थी. एक दिन जब क्लास में बोरियत बढ़ गई तो शाहरुख़ ने मिर्गी का दौरा आने का नाटक किया. शिवनाथ झा अपनी किताब शाहरुख़ ख़ान हिज़ इनक्रेडिबल जर्नी फ़्रॉम चाइल्डहुड टु सुपरस्टारडम में लिखते हैं, शाहरुख़ ज़मीन पर गिर पड़े और उनके मुँह से झाग निकलने लगा. उनके सहपाठियों ने अध्यापक को राज़ी कर लिया कि शाहरुख़ को स्वीड (चमड़ा) का जूता सुंघा कर ही होश में वापस लाया जा सकता है. अध्यापक उस समय स्वीड का जूता पहने हुए थे. उन्होंने तुरंत अपना एक जूता उतार कर दे दिया. सारे लड़के शाहरुख़ को डॉक्टर को दिखाने का बहाना बना कर कक्षा के अध्यापक के उस जूते समेत निकल लिए. पूरे दिन वो सब स्कूल के बाहर मटरगश्ती करते रहे और उनके अध्यापक को पूरा दिन एक जूते के बिना नंगे पैर बिताना पड़ा. बैरी जॉन की छत्रछाया में अभिनय शाहरुख़ को अभिनय का इतना शौक था कि वे दिल्ली की रामलीला कमेटी राम चंद्र छाबड़ा की रामलीला में अभिनय किया करते थे. उन्होंने डेविड लेटरमैन के टीवी कार्यक्रम माई नेक्स्ट गेस्ट में बताया था कि उनका इतना छोटा रोल होता था कि हनुमान की लाइन सियापति रामचंद्र की... के बाद उन्हें सिर्फ़ जय कहना होता था. शाहरुख़ को सबसे पहले दिल्ली के एक नाट्यकर्मी और थिएटर आर्ट ग्रुप के संस्थापक बैरी जॉन ने बताया था कि उन्हें फ़िल्मों में होना चाहिए. उन्होंने उनके एक नाटक ऐनी गेट यौर गन में काम किया था. शाहरुख़ उस ज़माने में भी अपने अभिनय से लोगों का ध्यान खींच लेते थे. उनके अभिनय में एक कुदरती अंदाज़ था. हालांकि, वो अभी भी अभिनय का क ख ग ही सीख रहे थे, लेकिन उनके साथी मानते थे कि वह बहुत ऊपर जाएंगे. टीएजी के निदेशक संजय रॉय का कहना था, शायद शाहरुख़ उस समय के सबसे अच्छे अभिनेता नहीं थे, लेकिन तब भी उनमें एक स्टार बनने के सारे लक्षण थे. उन दिनों भी उनकी शख़्सियत में एक जन्मजात उछाल देखने को मिलता था. उन्होंने सबसे पहले एक शॉर्ट फ़िल्म इन विच ऐनी गिव्स इट दोज़ वन में काम किया. इसको प्रदीप कृष्ण ने निर्देशित किया था और इस फ़िल्म की हीरोइन थीं मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय

हिन्दी फ़िल्मों के ब्रांड एंबेसडर और 'रोमांस के किंग' शाहरुख़ ख़ान की कहानी
-रेहान फ़ज़ल भारत के लोगों के बारे में कहा जाता है कि वो फ़िल्मों के लिए पागल हैं. दुनिया में सबसे अधिक करीब 1500 से 2000 के बीच फ़िल्में भारत में बनती हैं. इनमें से करीब 120 से 140 फ़िल्में हिन्दी में होती हैं. कई आकलनों में ऐसा दावा किया जाता है कि देश भर की करीब 30 हज़ार स्क्रीनों पर डेढ़ करोड़ लोग रोज़ फ़िल्में देखते हैं. भारत के लोग चाहे वो देश में रहने वाले हों या फिर विदेश में रह रहे हों, उनमें शाहरुख़ ख़ान की जबरदस्त फ़ैन फ़ॉलोइंग है. उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि मुंबई में लोग उनके बंगले को उस तरह देखने जाते हैं, जैसे वो कोई पर्यटन स्थल हो. कभी-कभी शाहरुख़ ख़ान बंगले के टैरेस पर आकर अपने चाहने वालों को हाथ हिला कर उनका मन जीत लेते हैं. मशहूर फ़िल्म पत्रकार अनुपमा चोपड़ा शाहरुख़ ख़ान की जीवनी किंग ऑफ़ बॉलीवुड शाहरुख़ ख़ान में लिखती हैं, पेशावर में एक मोहल्ला है ढाकी नाल बंदी. वहाँ एक घर है जहाँ एक ज़माने में पृथ्वीराज कपूर रहा करते थे. वहाँ से पाँच मिनट की दूरी पर एक और मोहल्ला है, डूमा गली जहाँ के एक घर में दिलीप कुमार का जन्म हुआ था. वे लिखती हैं, इन दोनों घरों के वॉकिंग डिस्टेंस पर एक और मोहल्ले शाहवाली क़तल की एक पतली गली के मकान नंबर 1147 में सन 1928 में शाहरुख़ ख़ान के पिता मीर ताज मोहम्मद का जन्म हुआ था. जब सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो करीब 60 हज़ार लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. गिरफ़्तार किए गए लोगों में मीर और उनके भाई गामा भी थे. ये देखते हुए कि उस इलाके की राजनीतिक अशांति मीर की पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है, उनके परिवार वालों ने सन 1946 में उन्हें दिल्ली भेज दिया. जब सन 1947 में भारत का विभाजन हुआ तो मीर ताज मोहम्मद दिल्ली में थे, लेकिन उनका कहने के लिए कोई अपना देश नहीं था क्योंकि उनकी राजनीतिक गतिविधियों और सरहदी गाँधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के साथ उनकी नज़दीकी के कारण उनके पेशावर जाने पर प्रतिबंध लगा हुआ था. 15 वर्ष की आयु में पिता को खोया आज़ाद भारत में मीर ताज मोहम्मद ने देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद के ख़िलाफ़ 1952 में चुनाव लड़ा, लेकिन उसमें उनकी हार हुई. आज़ादी के 13 साल बाद उनकी मुलाक़ात हैदराबाद की रहने वाली फ़ातिमा से हुई जिनसे उन्होंने काफ़ी मशक्कत के बाद विवाह किया. शाहरुख़ ख़ान का जन्म 2 नवंबर, 1965 को हुआ. दिल्ली के तलवार नर्सिंग होम में उनका जन्म हुआ. वह मीर और फ़ातिमा की दूसरी औलाद थे. उस ज़माने में वे दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में रहा करते थे. मोहर बसु शाहरुख़ की जीवनी लीजेंड, आइकन, स्टार शाहरुख़ ख़ान में लिखती हैं, शाहरुख़ के पिता उन्हें यार कह कर पुकारते थे. शाहरुख़ का बचपन एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के ज़माने में बीता. उस समय वो अमिताभ बच्चन के बहुत बड़े फ़ैन हुआ करते थे. उन दिनों उनकी दोस्त अमृता सिंह उनके साथ अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखने जाया करती थीं. ये दोनों पैसे बचाने के लिए अक्सर हॉल में सबसे आगे बैठा करते थे. बाद में उन्होंने सन 1983 में आई बेताब फ़िल्म से अपने करियर की शुरुआत की थी. शाहरुख़, उनकी बड़ी बहन शहनाज़ और अमृता एक ही स्कूल में पढ़ा करते थे. अमृता ने उन्हें तैराकी सिखाने की भरपूर कोशिश की लेकिन वे उसमें कामयाब नहीं हुईं. जब शाहरुख़ सिर्फ़ 15 वर्ष के थे, उनके पिता का कैंसर की बीमारी से निधन हो गया. स्कूल की शरारतें सन 1972 में शाहरुख़ ख़ान का दाख़िला दिल्ली के मशहूर सेंट कोलंबस स्कूल में कराया गया. स्कूल में साफ़ नाख़ून और छोटे बाल रखने के नियम बहुत सख़्त थे. बड़े बाल वाले लड़कों को स्कूल से सीधे गोल मार्केट के पास बाल कटवाने की दुकान पर भेज दिया जाता था. बड़े बाल रखने वाले शाहरुख़ को अक्सर उस दुकान पर भेजा जाता था. 11वीं कक्षा में पहुंचते-पहुंचते शाहरुख़ की हिम्मत बढ़ गई थी. एक दिन जब क्लास में बोरियत बढ़ गई तो शाहरुख़ ने मिर्गी का दौरा आने का नाटक किया. शिवनाथ झा अपनी किताब शाहरुख़ ख़ान हिज़ इनक्रेडिबल जर्नी फ़्रॉम चाइल्डहुड टु सुपरस्टारडम में लिखते हैं, शाहरुख़ ज़मीन पर गिर पड़े और उनके मुँह से झाग निकलने लगा. उनके सहपाठियों ने अध्यापक को राज़ी कर लिया कि शाहरुख़ को स्वीड (चमड़ा) का जूता सुंघा कर ही होश में वापस लाया जा सकता है. अध्यापक उस समय स्वीड का जूता पहने हुए थे. उन्होंने तुरंत अपना एक जूता उतार कर दे दिया. सारे लड़के शाहरुख़ को डॉक्टर को दिखाने का बहाना बना कर कक्षा के अध्यापक के उस जूते समेत निकल लिए. पूरे दिन वो सब स्कूल के बाहर मटरगश्ती करते रहे और उनके अध्यापक को पूरा दिन एक जूते के बिना नंगे पैर बिताना पड़ा. बैरी जॉन की छत्रछाया में अभिनय शाहरुख़ को अभिनय का इतना शौक था कि वे दिल्ली की रामलीला कमेटी राम चंद्र छाबड़ा की रामलीला में अभिनय किया करते थे. उन्होंने डेविड लेटरमैन के टीवी कार्यक्रम माई नेक्स्ट गेस्ट में बताया था कि उनका इतना छोटा रोल होता था कि हनुमान की लाइन सियापति रामचंद्र की... के बाद उन्हें सिर्फ़ जय कहना होता था. शाहरुख़ को सबसे पहले दिल्ली के एक नाट्यकर्मी और थिएटर आर्ट ग्रुप के संस्थापक बैरी जॉन ने बताया था कि उन्हें फ़िल्मों में होना चाहिए. उन्होंने उनके एक नाटक ऐनी गेट यौर गन में काम किया था. शाहरुख़ उस ज़माने में भी अपने अभिनय से लोगों का ध्यान खींच लेते थे. उनके अभिनय में एक कुदरती अंदाज़ था. हालांकि, वो अभी भी अभिनय का क ख ग ही सीख रहे थे, लेकिन उनके साथी मानते थे कि वह बहुत ऊपर जाएंगे. टीएजी के निदेशक संजय रॉय का कहना था, शायद शाहरुख़ उस समय के सबसे अच्छे अभिनेता नहीं थे, लेकिन तब भी उनमें एक स्टार बनने के सारे लक्षण थे. उन दिनों भी उनकी शख़्सियत में एक जन्मजात उछाल देखने को मिलता था. उन्होंने सबसे पहले एक शॉर्ट फ़िल्म इन विच ऐनी गिव्स इट दोज़ वन में काम किया. इसको प्रदीप कृष्ण ने निर्देशित किया था और इस फ़िल्म की हीरोइन थीं मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय. इस फ़िल्म में शाहरुख़ के सिर्फ़ चार सीन थे और उनके किरदार को कोई नाम नहीं दिया गया था. उस ज़माने में शाहरुख़ दिल्ली के हंसराज कॉलेज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन बैरी जॉन पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें अभिनय के गुर भी सिखा रहे थे. फ़ौजी सीरियल से मिली राष्ट्रीय पहचान शाहरुख़ को पहली बार राष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली टेलीविज़न सीरियल फ़ौजी से. उस समय शाहरुख़ एक और सीरियल दिल दरिया में भी काम कर रहे थे और लंच ब्रेक के दौरान फ़ौजी की शूटिंग किया करते थे. मोहर बसु लिखती हैं, फ़ौजी के ऑडिशन के दौरान शाहरुख़ का बहुत कठिन टेस्ट लिया गया था. सुबह बहुत तड़के नींद से जगा कर उन्हें डेढ़ मील तक दौड़ाया गया था. उसके तुरंत बाद उनका एक बॉक्सिंग मुकाबला करवाया गया था. शाहरुख़ ने अपने अनुशासन से सबका ध्यान खींचा था. बहुत से लोगों ने बीच में ही दौड़ छोड़ दी लेकिन शाहरुख़ डटे रहे. शुरू में शाहरुख़ को एक छोटे रोल के लिए चुना गया था और लीड रोल सीरियल के प्रोड्यूसर कर्नल राज कपूर के बेटे को करना था. इस लिहाज़ से शाहरुख़ बहुत भाग्यशाली थे कि वो सही समय पर सही जगह थे. फ़ौजी की लेखिका और अभिनेत्री अमीना शेरवानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि फ़ौजी का एक एपिसोड बनाने में दो लाख रुपए लगते थे, जो उस ज़माने में बड़ी रकम हुआ करती थी. द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में शेरवानी ने बताया था, मुझे याद है सेना को हमें शूटिंग के लिए स्टेन गन और दूसरे उपकरण देने थे, लेकिन उन्होंने हमें हाथ तक लगाने नहीं दिया. हमने किसी तरह एक कमांडों से टूटी हुई स्टेन गन का इंतज़ाम करवाया. हमने उसके एल्युमिनियम के 12 साँचे बनवाए जो कि बिल्कुल असली जैसे दिखाई देते थे. एक दिन हम उन हथियारों को ऑटो में ले जा रहे थे कि एक पुलिसवाले ने हमें रोक लिया. ये तो ग़नीमत थी कि हम पहले दिल्ली पुलिस के लिए एक फ़िल्म बना चुके थे, इसलिए पुलिस कमिश्नर को पता था कि हम क्या कर रहे हैं. हमारी सबसे चुनौती थी शाहरुख़ को अपने बाल कटवाने के लिए राज़ी करवाना. वो इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे. बड़ी मुश्किल से वो इसके लिए राज़ी हुए. लेकिन फ़ौजी को शूट होते हुए देखना एक सुपरस्टार के उदय को देखने की तरह था. बाहरी वेशभूषा और रूप की अनदेखी जब शाहरुख़ अभिनय के मौके तलाशने मुंबई गए तो उनकी जिम-टोन्ड बॉडी नहीं हुआ करती थी. चमत्कार फ़िल्म में शाहरुख़ के निर्देशक रहे राजीव मेहरा ने एक इंटरव्यू में बताया था, उन दिनों शाहरुख़ अपने लुक पर कोई ख़ास ध्यान नहीं देते थे. उन दिनों उनके पास अपने बालों के लिए जेल ख़रीदने के पैसे नहीं होते थे. इसलिए वो अपने बाल को कैमलिन गोंद और पानी से चिपकाते थे. उनकी आँखों के चारों तरफ़ गड्ढे हुआ करते थे क्योंकि वो रात दो बजे से पहले कभी सोने नहीं जाते थे. प्रोड्यूसर जी पी सिप्पी ने एक इंटरव्यू में कहा था, उन दिनों शाहरुख़ के बाल रूखे-सूखे होते थे. वह फ़िल्मी हीरो जैसे कतई नहीं दिखते थे. आमिर और सलमान की तरह उनकी त्वचा का रंग भी गोरा नहीं था. उस समय तक किसी भी टेलीविज़न स्टार ने फ़िल्मों में सफल एंट्री नहीं ली थी, लेकिन उनका टेलीविज़न रिज्यूमे उनके लिए वरदान साबित हुआ और अपनी अव्यवस्थित शख़्सियत के बावजूद उनके पास तेज़ी से फ़िल्मों के ऑफ़र आने लगे. गौरी छिब्बर से शादी शाहरुख़ की गौरी छिब्बर से पहली मुलाकात तब हुई जब वो 18 साल के थे और गौरी सिर्फ़ 14 साल की थीं. वो पंचशील पार्क के बहुत समृद्ध परिवार से आती थीं. शाहरुख़ उनके हिस्ट्री के नोट्स बनाने में उनकी मदद करते थे. उन्होंने उन्हें ड्राइविंग भी सिखाई थी. गौरी के माता-पिता ने उनकी शाहरुख़ के साथ शादी का विरोध किया था, लेकिन शाहरुख़ आखिरकार उन्हें मनाने में कामयाब हो गए. दोनों की हिंदू रीति-रिवाज़ और कोर्ट मैरिज दोनों तरह से शादी हुई. मोहर बसु लिखती हैं, शादी के अंजाम तक पहुंचते-पहुंचते शाहरुख़ गौरी के घर वालों के प्रिय बन चुके थे. गौरी के घर वालों से रिश्तों में सुधार का पहला संकेत तब मिला, जब गौरी की माँ ने उनकी तारीफ़ करते हुए कहा, मुझे नहीं पता था कि तुम देखने में इतने अच्छे हो. जब विदाई का समय आया तो गौरी कार में बैठते ही रोने लगीं. उनकी माँ, पिता और भाइयों ने भी रोना शुरू कर दिया. शाहरुख़ ने अचानक गंभीर होते हुए कहा, अगर आप लोगों को गौरी के जाने का इतना ही दुख है तो आप उसे अपने पास रखिए. मैं उससे मिलने आता रहूँगा. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने बनाया स्टार बॉलीवुड में शाहरुख़ की पहली फ़िल्म थी, दीवाना, लेकिन जिस फ़िल्म ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी वो थी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे. सन 2001 में इस फ़िल्म ने एक हॉल में लगातार चलने वाली शोले का रिकार्ड तोड़ दिया था. शोले लगातार पाँच सालों तक चली थी. एक अनुमान के अनुसार दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के साउंड ट्रैक की करीब ढाई करोड़ कॉपियां बिकीं. अनुपमा चोपड़ा ने लिखा, जब-जब इस फ़िल्म ने कोई भी मील का पत्थर पार किया, पहले पाँच साल, फिर 100 हफ़्ते, फिर 10 साल, हर बार इस मौके को कवर करने के लिए पत्रकारों का एक जमघट मराठा मंदिर पर जमा होता. इस बीच शाहरुख़ की कई ब्लॉकबस्टर्स आईं, उनके दो बच्चे पैदा हुए. आदित्य चोपड़ा की शादी हुई, तलाक भी हो गया, काजोल की भी शादी हुई, उनकी एक बेटी भी हो गई, वो तीन सालों के लिए फ़िल्मों से रिटायर हो गईं, उनकी पर्दे पर वापसी भी हुई लेकिन दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे लगातार एक हॉल में चलती रही. महिलाओं के बीच लोकप्रियता सन 1997 में आई शाहरुख़ की फ़िल्म दिल तो पागल है भी जबरदस्त हिट हुई और इसने शाहरुख़ को फ़ील गुड सिनेमा का पोस्टर ब्वॉय बना दिया. शाहरुख़ ने अपनी भूमिकाओं और शख़्सियत से महिलाओं के बीच अपनी ख़ूब पैंठ बना ली. शाहरुख़ को अपनी पत्नी के ज़मीन छू रहे ड्रेस का कोना पकड़ने में कोई परहेज़ नहीं था. वो रसोई में अपनी प्रेमिका के माँ के काम में हाथ बँटाते हुए बहुत सहज दिखते थे, लड़कियों के लिए कार का दरवाज़ा खोलना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था. ताक्षी मेहता ने वोग इंडिया के जून, 2002 के अंक में 30 इयर्स ऑफ़ शाहरुख़ ख़ान लेख में लिखा, ख़ान महिलाओं को पुरुषों की ऑब्जेक्ट ऑफ़ डिज़ायर की दृष्टि से नहीं देखते. उनकी आँखों में उनके लिए हमेशा नरमी रहती है. जब हैरी मेट सेजल के प्रोमोशन के दौरान दिए गए इंटरव्यू में शाहरुख़ ने कहा था, मुझे पता है कि औरतों का सम्मान कैसे किया जाता है. माधुरी दीक्षित ने एक बार उनके बारे में कहा था, वो फ़िल्म इंडस्ट्री के सबसे अच्छे शख़्स हैं. अच्छे होने से मेरा मतलब उनके शरीफ़ होने से है. वो फ़िल्म के सेट से तब तक नहीं जाते जब तक वो ये सुनिश्चित नहीं कर लेते कि उनके साथ काम कर रही महिला कलाकार शूट के बाद सुरक्षित अपने घर के लिए निकल गई हैं. शाहरुख़ का एक वीडियो बहुत वायरल हुआ था जिसमें वो दिलीप कुमार के अंतिम संस्कार के दौरान भीड़ के नियंत्रण के लिए तैनात मुंबई पुलिस के एक सिपाही को सलाम कर रहे हैं. फ़्लॉप फ़िल्मों के बाद वापसी शाहरुख़ ने कभी हाँ कभी ना, कोयला, परदेस, अशोका, कभी ख़ुशी कभी ग़म, वीर-ज़ारा जैसी हिट फ़िल्में दीं. वहीं रा.वन, डॉन 2,फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, ज़ीरो जैसी फ़िल्मों के फ़्लॉप होने से इस चर्चा को बल मिला कि शाहरुख़ का सर्वश्रेष्ठ बीत चुका है. लेकिन हर बार उन्होंने एक हिट देकर ज़बरदस्त वापसी की. उनके बारे में कहा गया कि वो बॉलीवुड के टैफ़लॉन मैन हैं जिन पर नाकामयाबी चिपकती नहीं. सन 2007 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. इसी साल लंदन के मशहूर मैडम तुसाद म्यूज़ियम में उनकी मोम की मूर्ति लगाई गई. फ़िल्म माइ नेम इज़ ख़ान ने भी शाहरुख़ को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई. मशहूर लेखक पाउलो कोएल्हो ने एक्स पर लिखा, शाहरुख़ ख़ान बादशाह, लीजेंड और दोस्त हैं. इस सबसे बढ़कर वो बहुत बड़े अभिनेता हैं. पश्चिम में जो लोग उन्हें नहीं जानते हैं, उन्हें मैं सलाह दूँगा कि वो उनकी फ़िल्म माइ नेम इज़ ख़ान देखें. विवादों में शाहरुख़ ख़ान सन 2012 में कोलकाता नाइट राइडर्स और मुंबई इंडियंस के मैच के बाद शाहरुख़ ख़ान ने कथित रूप से सुरक्षा कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया जिसके बाद उनके वानखेड़े स्टेडियम में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. हालांकि, बाद में शाहरुख़ ख़ान ने सफ़ाई दी कि ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि सुरक्षाकर्मी उनके बच्चों और उनके दोस्तों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे थे. इससे पहले जयपुर की एक अदालत ने एक आईपीएल मैच के दौरान सार्वजनिक रूप से सिगरेट पीने के आरोप में उन्हें तलब किया था. उन पर आरोप था कि वो हज़ारों दर्शकों के सामने सिगरेट पी रहे थे, जिसे पूरी दुनिया में लाइव दिखाया जा रहा था. सन 2021 में शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान को ड्रग्स रखने और इस्तेमाल करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. बाद में उन पर ये आरोप सही नहीं साबित हुए. सन 2013 में जब शाहरुख़ की फ़िल्म पठान रिलीज़ हुई तो एक गाने में फ़िल्म की हीरोइन दीपिका पादुकोण की पोशाक पर कुछ लोगों और नेताओं ने आपत्ति उठाई. कई दक्षिणपंथी तत्वों ने फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने तक की माँग की. लेकिन इसके बावजूद फ़िल्म की लोकप्रियता पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. चक दे इंडिया में शानदार अभिनय उनकी एक और फ़िल्म ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा, वो थी चक दे इंडिया. अनुपमा चोपड़ा लिखती हैं, कमल हासन की हे राम का छोटा रोल छोड़ दें तो शाहरुख़ ने पहली बार सन 2007 में आई चक दे इंडिया में किसी फ़िल्म में एक मुस्लिम चरित्र निभाया था. लेकिन इस फ़िल्म में भी हम शाहरुख़ को कभी नमाज़ पढ़ते नहीं देखते. पूरी फ़िल्म के दौरान वो पश्चिमी कपड़े पहनते हैं. मेरा मानना है कि चक दे में शाहरुख़ ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है. भारत के सबसे बड़े रोमांटिक स्टार ने इस फ़िल्म में कोई इश्क नहीं किया. लेकिन इस फ़िल्म में भी उसका इश्क था. वो इश्क था हॉकी से, देश से और जीत से. जब सन 2007 में भारत ने टी20 विश्व कप जीता था तो भारत की हर सड़क पर इस फ़िल्म का टाइटिल ट्रैक सुनाई पड़ा था, मानो वो कोई दूसरा राष्ट्रगान हो. शाहरुख़ ख़ान के बारे में कहा जा सकता है कि वो बॉलीवुड और भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर हैं. उन्होंने जिस हद तक दुनिया में हिन्दी फ़िल्मों की पहुंच को विस्तार दिया है, उतना शायद किसी भी अभिनेता ने नहीं दिया.(bbc.com/hindi)